स्वतंत्र भारत का कण-कण सदा ही अखंड लौ से प्रकाशित रहेगा : आशुतोष महाराज

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New Delhi News, 10 Aug 2019 : 15 अगस्त 1947, भारत की आज़ादी का दिन यादगार और ऐतिहासिक दिन है। पूर्वजों के बलिदान से मिले इस आज़ादी के खजाने को यदि हम संभाल कर रखना चाहते हैं तो समय रहते यह समझना होगा की हमें गुलामी से मुक्ति कैसे मिली| यदि हम अपना भविष्य उज्ज्वल बनाना चाहते हैं तो अपने वर्तमान को संवारना होगा और वर्तमान को समझने के लिए भूतकाल में देखना पड़ेगा|

लगभग 1000 साल तक हमने यूनानियों, यहूदियों, मुग़लों और अंग्रेज़ों जैसे कई हमलावारों से निरंतर संघर्ष किया| इन हमलावारों का सदैव से एक ही मकसद रहा- भारतीय संस्कृति और धर्म को नष्ट करने के साथ-साथ आर्थिक शोषण करना| जहाँ यूनानियों और मुग़लों ने हमारे देश को बड़ी ही भीषणता से लूटा वहीं अंग्रेज़ कानूनों की मोहर लगा कर देश को लूटते रहे| भारत में व्यापार करने आई इंगलैंड की ईस्ट इंडिया कंपनी ने उस वक्त देश में फ़ैली अराजकता का लाभ उठाते हुए देश की आर्थिक प्रणाली के साथ-साथ राजनीतिक प्रभुसत्ता भी हासिल कर ली| भारत देश पर अंग्रेज़ों ने 200 साल राज कर देश को आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और नैतिक तौर पर लूटने में अपना पुरज़ोर लगा दिया| मैकॉले जैसे अंग्रेज़ नीतिकारों की भारतीय संस्कृति को नष्ट करने वाली नीतियों ने भी देश को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी| अंग्रेज़ों ने भारतीय व्यापार, कला, हुनर और सभ्यता को हर पक्ष से लूटा और बर्बाद किया| समय-समय पर भारतीय ज़मीर अंग्रेज़ियत के खिलाफ आवाज़ उठाता रहा पर आपसी एकता और संगठन न होने के कारण 1857 की क्रांति की तरह हम असफल होते रहे और अंग्रेज़ कामयाब होते रहे|

सृष्टि का नियम है कि कोई भी स्वाभिमानी कौम ज्यादा देर तक गुलाम नहीं रह सकती और भारतीय तो हैं ही अमृत की संतानऔर हमेशा परमात्मा का अवतरण भारत भूमि पर ही होता आया है| फिर यह भूमि गुलाम कैसे रह सकती थी? इन्हीं भावनाओं से सराबोर होकर भारत माँ के कई सपूतों ने अपनी जवानी और जीवन को न्योछावर कर दिया और लगभग 200 सालों के संघर्ष के बाद भारतवासियों को अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ादी मिली|गुलामी से आज़ादी तक के इस सफर में जो अहम जागृतियाँ और क्रांतियां आई उनका वर्णन निम्नलिखित है|

साहित्यिक योगदान: आज़ादी प्राप्ति में भारतीय साहित्य का विशेष योगदान रहा है| अनेक कवियों, लेखकों, उपन्यासकारों और नाटककारों ने अपनी रचना के माध्यम से आज़ादी की प्रेरणा दी| “वन्दे मातरम्”, “मेरा रंग दे बसंती चोला”,”सरफरोशी की तमन्ना”, “सारे जहाँ से अच्छा” इत्यादि अनेक ऐसी रचनाएँ हैं जो आज भी भारतवासियों के दिलों में तरोताजा हैं| देश-भक्ति और आज़ादी के गीत घर-घर में गुनगुनाए जाते| देश-भक्ति और आज़ादी के भावों से सराबोर अख़बार और पत्रिकाएं भी प्रकाशित की जाती जिनके माध्यम से क्रांतिकारियों की गतिविधियाँ लोगों तक पहुंचाई जाती| जगह-जगह कवि दरबार लगाए जाते थे जिनमें वीर रस से ओतप्रोत देश-भक्ति के गीत गाए जाते| इन साहित्यिक रचनाओं के प्रभाव स्वरूप भारतीय विद्यार्थियों और अध्यापकों ने सरकारी नौकरी छोड़ स्वदेशी संगठनों में शिक्षा देनी और लेनी शुरू कर दी| तिलक, नेताजी, महात्मा गांधी, वैद्य गुरुदत्तआदि द्वारा चलाई गयी स्वदेशी संस्थाओं ने भारतवासियों को जाग्रत करने में अपना पूर्ण योगदान दिया|

क्रांतिकारी संगठन: आज़ादी की प्राप्ति में क्रांतिकारी संगठनों की भी अहम भूमिका रही| सुभाष चंद्र बोस, करतार सिंह सराभा, वीर सावरकर, लाला हरदयाल, सुखदेव, राजगुरु, राम प्रसाद बिस्मिल, मदन लाल ढींगरा, चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह जैसे कई शूरवीरों ने अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद की| इन्होंने अंग्रेज़ों के जुल्म का जवाब ‘मौत के बदले मौत’ से दिया| अपने निजी सुखवइच्छाओं का त्याग कर अपना सम्पूर्ण जीवन मातृभूमि पर कुर्बान कर दिया| क्रांतिकारियों के आंदोलनों ने देश के नौजवानों में मर-मिटने और कुर्बानी का ऐसा जज़्बा भरा कि अंग्रेज़ी सरकार की चूलें हिल गयी और देश आज़ाद हो गया|

धार्मिक जाग्रति: जब भारत में अंग्रेजी सरकार स्थापित हुई तो उन्होंने भारतीय धर्म को पूरी तरह नष्ट करने के लिए कई हत्कंडे अपनाये| इस नाज़ुक मौके को सँभालने और धर्म का पुनरुत्थान करने के लिए भारतीय सन्यासी और संत आगे आए क्योंकि अध्यात्म ही राष्ट्रीयता की सही भावना को समझ सकता है और जन मानव तक पहुँचा सकता है| महर्षि दयानन्द, महर्षि अरविन्द और स्वामी रामतीर्थ जैसे कई सन्यासियों ने अपने-अपने विचारों से भारतीयों के धर्म को जगाया| वह अपने व्याख्यानों में भारतीय धर्म की श्रेष्ठता और विशेषता का वर्णन किया करते| संस्कृत भाषा के उत्थान के लिए अनेक प्रयत्न किए| स्वामी विवेकानन्द जी ने 1893 में अमरीका के शिकागो शहर में आयोजित विश्व धर्म सभा में सनातन धर्म की महानता और विशालता सम्बन्धी विचार देकर अंग्रेज़ों के मुंह बंद कर दिए| इस प्रकार जब युवा सन्यासियों द्वारा भारतीय संस्कृति का प्रचार हुआ तो भारतीय लोगों के मन में विदेशी राज के प्रति घृणा बढ़ती गयी और लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया|

स्वामी विवेकानन्द जी कहा करते थे कि भारत देश धर्म दर्शन और प्रेम की जनम भूमि है| यह सब चीज़ें आज भी भारत में मौजूद हैं और आज भी भारत इनमें बाकी देशों से श्रेष्ठ है| इसलिए हमारा यह कर्तव्य बनता है कि गुरुओं-पीरों, संतों, फकीरों और शूरवीरों के बलिदान से मिली इस आज़ादी को संभाल कर रखें और भारत को पुन: ‘जगद्गुरु’ की उपाधि दिलवाएं!

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