नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा ,नई दिल्ली के नाट्य शाला में प्रमुखता के साथ दर्शाया गया नाटक “संक्रमण”

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फरीदाबाद : पाई पाई जोड़कर एवं सहेज कर घर चलाने के पिता के जो विचार रोग लगते थे, पिता की मृत्यु के बाद वही विचार संक्रमण की तरह पुत्र में आते देखकर पूरा परिवार अचंभित होता है। पेट काट कर बसाए हुए घर में बच्चों की घर के प्रति लापरवाही देखकर पिता को बहुत पीड़ा पहुंचती है। इन्हीं मुद्दों को मुख़ा मुख़म मंच,बल्लबगढ़ (फरीदाबाद ) द्वारा मंचित नाटक “संक्रमण” में नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा ,नई दिल्ली के नाट्य शाला में प्रमुखता के साथ दर्शाया गया है। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, नई दिल्ली से स्नातक सुन्दर लाल छाबड़ा द्वारा निर्देशित नाटक के सजीव मंचन ने दर्शकों को झकझोर कर रख दिया।

भाजपा व्यवसायिक प्रकोष्ठ के जिला संयोजक विमल खंडेलवाल, शिक्षाविद डॉ बांके बिहारी, प्रसिद्ध अधिवक्ता कैलाश वसिष्ठ ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर नाटक मंचन का शुभारंभ किया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से अग्रवाल समिति बल्लभगढ़ के अध्यक्ष जितेंद्र सिंगला, राकेश गर्ग, पंकज गर्ग के अतिरिक्त अनेकों गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। मुख़ा मुखम मंच के अध्यक्ष ललित गोयल एवं सचिव ओमदत्त शर्मा ने आए हुए अतिथियों का स्वागत किया। नाटक में कामता प्रसाद की मुख्य भूमिका स्वयं निर्देशक सुन्दर लाल छाबड़ा ने कर अपने अभिनय कौशल की अमिट छाप छोड़ी। कामता प्रसाद की जवानी के दिनों की भूमिका योगेश, सरला की भूमिका दीपिका एवं पिंटू की भूमिका शानू शफीक ने निभाई। प्रियम, राघव, सूरज, शिवम, अनुराग एवं श्री हरि ने भी अपने अभिनय से नाटक में जान फूंक दी। नाटक मंचन में संगीत संचालन सक्षम एवं प्रकाश व्यवस्था का दायित्व राघव व ज़ुबैर ने संभाला। विमल खंडेलवाल ने कहा कि कलाकारों ने अपने अभिनय से कहानी को जीवंत कर दिया और कहा कि सम्पूर्ण नाटक का कथानक हम सभी के जीवन की असल कहानी है जिस में कहीं ना कहीं इस असलियत से रूबरू होते दिखाई देते हैं वहीं शिक्षाविद बांके बिहारी ने कलाकारों के अभिनय कौशल एवं प्रस्तुतीकरण को सराहा और कहा कि मध्य वर्गीय परिवारों में आर्थिक विषमताओं के चलते ऐसी मानसिकता का द्वंद्व होना स्वाभाविक है निरन्तर पिता के अभ्यास से उसके पुत्र में स्वभाविक रूप से संस्कार स्थापित होना नाटक की अन्तिम पराकाष्ठा का परिचायक है .

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