‘Om Ka Hari’ Trailer Out: Anshuman Jha and Raghubir Yadav Take on the Oldest Rivalry — Father vs Son
‘Om Ka Hari’ Trailer Out: Anshuman Jha and Raghubir Yadav Take on the Ol…
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श्रीमद् देवी भागवत कथा में नवरात्रि पर्व का माहात्म्य एवं महिषासुर वध गाथा का विस्तृत वर्णन किया गया
रोहिणी सेक्टर 17, दिल्ली. दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित 7 दिवसीय श्रीमद् देवी भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन की कथा में सुमधुर भक्ति गीतों के साथ भव्य विजयदशमी उत्सव भी मनाया गया। द्वितीय दिवस की कथा में दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या कथा व्यास साध्वी अदिति भारती ने नवरात्रि पर्व का माहात्म्य एवं महिषासुर वध गाथा का विस्तृत वर्णन किया।भारतीय शास्त्र ग्रंथों की विलक्षणता को उद्घाटित करते हुए साध्वी जी ने बताया की माँ के अवतरण की यह विविध कहानियाँ अपने भीतर जीवन परिवर्तनीय व समाज को आंदोलित करने वाले विलक्षण रहस्यों को समेटे है।
महिषासुर वध की गाथा का भी गूढ़ विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए साध्वी जी ने बताया कि महिषासुर एक पौराणिक पात्र नहीं अपितु आज समाज मे बढती हिंसा, बढ़ते बलात्कार, देह व्यापार, बढती अश्लीलता और पथभ्रष्ट होते युवा इस सब का मूल कारण मानव अंतस्त मे जोर पकड़ते काम वासना से विक्षिप्त हुआ महिषासुर रुपी मन ही है। माँ का महिषमर्दिनी स्वरुप इन सब महिषासुरों के लिए चुनौती है।
दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के वचनों को रखते हुए, साध्वी जी ने बताया कि हर युग में यही महिषासुरी वृत्ति अलग अलग आततायियों के रूप में प्रकट होती है समाज में अराजकता और अत्याचार का विस्तार करती है। सत्ता और वर्चस्व की अंधी दौड़ में पागल कई आततायी शासकों ने भारत भूमि को गुलामी के अंधकार में धकेला है। मानव मूल्यों का ह्रास हुआ और महान भारतीय संस्कृति को खंडित करने के कई प्रयास किए गए। नारी शक्ति का तिरस्कार और उसका शोषण इन काल खंडों में सबसे ऊपर रहा - चाहे वह मुगलों का आक्रमण हो या फिर अंग्रेजों का शासन। जब जब नारी का ऐसा शोषण हुआ है तब तब वह शक्ति नारी रूप में आततायियों को चुनौती देने आती है।
दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी समझाते हैं कि जब जब संस्कृति का तिरस्कार हुआ है तब तब भारत की संगठित शक्ति अर्थात् महिषासुर मर्दिनी का प्रकटीकरण हुआ है।योग के विज्ञान को सिद्ध कर भारत भूमि पर हुए संतों महापुरुषों ने सामाजिक चेतना को जागृत करने के लिए ब्रह्मज्ञान के माध्यम से घट घट में भगवती का जागरण कर मानसिक गुलामी और दुर्बलता का नाश किया। तत्पश्चात इस आध्यात्मिक तेज को संगठित कर देश भर में क्रांति का बिगुल बजाया और आक्रांताओं का अंत किया।
विजयदशमी पर्व के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक महत्व को
कथाव्यास साध्वी अदिति भारती जी ने कहा कि अत्याचार से मुक्ति का यह दिवस, आतंक से स्वतंत्रता का यह दिवस
हमे असुरता से मुक्ति प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। यूँ तो साल दर साल हम
विजयदशमी मना रहे हैं,
दुर्गा की पूजा करते
हैं, रावण के पुतले का दहन करते हैं, परंतु वास्तविक विजयदशमी तब हो
होगी जब मानव के मन में प्रबल हुए महिषासुर का अंत होगा।मन के भीतर पनप रहे
महिषासुर का सूत्र समझाते हुए साध्वी जी ने सतगुरु प्रदत्त ब्रह्मज्ञान की
अनिवार्यता को रखा और कह की शांतमय विश्व की स्थापना हेतु सकारात्मकता को संगठित
होना होगा।