अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर क्राफ्ट मेला में यूपी के मूंज-काश हस्तशिल्प उत्पादों की भव्य प्रस्तुति
- महिलाओं को मिल रहा रोजगार और आत्मनिर्भरता
सूरजकुंड (फरीदाबाद) 4 फरवरी।
अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेला-2026 में देश के विभिन्न राज्यों से आए कारीगर अपनी पारंपरिक कला और हस्तशिल्प का उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी कड़ी में थीम स्टेट उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले से आए स्टॉल नंबर 312 पर प्रदर्शित मूंज और काश से बने पारंपरिक उत्पाद मेलार्थियों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।
स्टॉल के संचालक मुनेन्द्र कुमार ने बताया कि उनके पास करीब 30 से 35 प्रकार के हस्तनिर्मित आइटम उपलब्ध हैं, जिनकी कीमत 150 रुपए से लेकर 1200 रुपए तक रखी गई है, ताकि हर वर्ग के लोग इन उत्पादों को आसानी से खरीद सकें। उन्होंने जानकारी दी कि ये सभी उत्पाद नदियों के किनारे उगने वाली मूंज और काश घास से तैयार किए जाते हैं, जो पूरी तरह प्राकृतिक, टिकाऊ, मजबूत और पर्यावरण के अनुकूल हैं।
मुनेन्द्र कुमार ने बताया कि इस कार्य को डालिमिया ग्रुप द्वारा संगठित रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है। इस समूह से लगभग 250 ग्रामीण महिलाएं जुड़ी हुई हैं, जो इन हस्तशिल्प उत्पादों के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। यह कार्य महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता, स्वरोजगार और सामाजिक सशक्तिकरण का अवसर प्रदान कर रहा है। उन्होंने बताया कि महिलाएं अपने घरों पर ही इन उत्पादों को तैयार करती हैं, जिससे उन्हें स्थायी आय का साधन मिल रहा है।
पारंपरिक कला और आधुनिक उपयोगिता का अनूठा संगम
स्टॉल पर मूंज और काश से बने फल टोकरी, पूजा डोर, कैस रोल, फ्लावर पॉट, पूजा थाल, फैंसी डलिया, लॉन्ड्री बास्केट, पोस्टर ,डोरी बास्केट, राउंड ट्रे, सजावटी टोकरियां, घरेलू भंडारण टोकरी, हैंडमेड ट्रे, पूजा सामग्री धारक, सजावटी बास्केट सहित अनेक आकर्षक और उपयोगी उत्पाद हैं। इन उत्पादों में पारंपरिक शिल्पकला, आधुनिक डिजाइन और उपयोगिता का सुंदर मेल देखने को मिल रहा है।
मेला में आए दर्शकों ने इन उत्पादों की मजबूती, सुंदर बनावट, प्राकृतिक स्वरूप और किफायती कीमत की सराहना की है। बड़ी संख्या में पर्यटक इन वस्तुओं को घरेलू उपयोग, सजावट और उपहार सामग्री के रूप में खरीद रहे हैं। कई विदेशी पर्यटकों ने भी इन हस्तनिर्मित उत्पादों में विशेष रुचि दिखाई है।
पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा
मुनेन्द्र कुमार ने बताया कि मूंज और काश से बने उत्पाद प्लास्टिक और सिंथेटिक सामग्री का एक बेहतर विकल्प हैं, जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह पहल स्वदेशी, प्राकृतिक और टिकाऊ उत्पादों को बढ़ावा देने के साथ-साथ पर्यावरण को सुरक्षित रखने में भी सहायक सिद्ध हो रही है। उन्होंने बताया कि डालिमिया ग्रुप का उद्देश्य केवल उत्पादों की बिक्री ही नहीं, बल्कि ग्रामीण कारीगरों को सशक्त बनाना, पारंपरिक कला को संरक्षित रखना और नए बाजार उपलब्ध कराना भी है। इस प्रकार यह पहल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के साथ-साथ भारत की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला रही है।
मेलार्थियों और प्रशासन की सराहना- भारतीय परंपरा और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक मजबूत कदम
सूरजकुंड मेला प्रशासन द्वारा ऐसे कारीगरों को बेहतर मंच उपलब्ध कराया गया है, जिससे वे अपनी कला और उत्पादों को देश-विदेश के दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत कर सकें। मेले में आने वाले आगंतुकों ने सीतापुर के इन पारंपरिक हस्तशिल्प उत्पादों की उच्च गुणवत्ता, उपयोगिता और सौंदर्य की सराहना की है। यह स्टॉल मेले में आने वाले हर दर्शक को ग्रामीण भारत की मेहनत, महिलाओं की आत्मनिर्भरता और पारंपरिक हस्तशिल्प की उत्कृष्टता से रूबरू करा रहा है। अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर सूरजकुंड मेला देश की पारंपरिक शिल्पकला, सांस्कृतिक विरासत और ग्रामीण प्रतिभा को सशक्त बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है। सीतापुर (यूपी) से आए मूंज-काश शिल्प उत्पाद न केवल भारतीय परंपरा की पहचान हैं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी मजबूती प्रदान कर रहे हैं।