जो ईश्वर का चिन्तन करता है वह स्वतः ही चिन्ता से मुक्त हो जाता है : साध्वी आस्था भारती

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Faridabad News, 28 March 2019 : फरीदाबाद, हरियाणा में ‘श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ’ का भव्य एवं विशाल आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के द्वितीय दिवस भगवान की अनन्त लीलाओं में छिपे गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों को कथा प्रसंगों के माध्यम से उजागर करते हुए दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के संस्थापक एवं संचालक श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या भागवताचार्या महामनस्विनी विदुषी सुश्री आस्था भारती जी ने आज अजामिल एवं प्रह्लाद प्रसंग प्रस्तुत किया। अजामिल प्रसंग प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया कि मानव के जीवन पर आसपास के दृश्यों का बहुत प्रभाव पड़ता है। अजामिल के द्वारा देखे गए एक अशलील दृश्य ने उसके जीवन को कुमार्ग पर बढ़ा दिया। भावी समाज के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करते हुए साध्वी जी ने कहा कि एक गलत दृश्य का यदि ऐसा दुष्परिणाम हो सकता है जो ऐसे समाज का क्या होगा जहाँ हर पल युवाओं व भावी पीढ़ी के आगे ऐसे ही वासनात्मक व अशलील दृश्य प्रस्तुत किए जा रहे हैं इसलिए केवल कोरी शिक्षा नहीं अपितु दीक्षा की भी परम आवश्यकता है। जिससे मानव सदा विवेकशील कर्म ही करे। आज ऐसी मूल्याधरित शिक्षा श्री आशुतोष महाराज जी के दिव्य मार्गदर्शन में ‘संपूर्ण विकास केन्द्र-मंथन’ द्वारा समाज में पहुँचाई जा रही है। विशेषकर जिसमें समाज के गरीब बच्चों को शिक्षित किया जा रहा है। जहाँ केवल उनका बौद्धिक विकास ही नहीं बल्कि आत्मिक उत्थान भी हो रहा है।

आगे उन्होंने बताया कि किस प्रकार भक्त प्रह्लाद ने ईश्वर भक्ति के सम्मुख अपने पिता हिरण्यकशिपु द्वारा दिए जाने वाले नाना प्रकार की यातनाओं की परवाह नहीं की तथा कोई भी प्रलोभन एवं बाध उसे भक्ति-मार्ग से विचलित नहीं कर पाई। साध्वी जी ने इस प्रसंग में बताया कि मुश्किल से मुश्किल घड़ी में भी भक्त घबराता नहीं, धैर्य नहीं छोड़ता! क्योंकि भक्त चिन्ता नहीं, सदा चिन्तन करता है और जो ईश्वर का चिन्तन करता है वह स्वतः ही चिन्ता से मुक्त हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण श्रीमाद्भाग्वात्गीता में कहते हैं जो भक्त ईश्वर को अनन्य भाव से भजते हैं उसका योगक्षेम स्वयं भगवान वहन करते हैं। परंतु ईश्वर का चिन्तन तभी होगा जब हमारे अन्दर उनके प्रति भाव होंगे। आज कितने ही लोग ईश्वर को पुकार रहे हैं किंतु वह प्रकट क्यों नहीं होता? द्रौपदी की ही लाज क्यों बचाई, प्रहलाद की रक्षा क्यों हुई, संत मीरा या कबीर जी की तरह वह हमारी रक्षा क्यों नहीं करता?

इसका कारण यह है कि हमने ईश्वर को देखा नहीं, जाना नहीं, उनकी शरणागति प्राप्त नहीं की। इसलिए हमारा प्रेम ईश्वर से नहीं हो पाया। हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है कि – जाने बिन न होई परतीती, बिन परतीती न होई प्रीति।

आज हम परमात्मा को केवल मानते हैं उसे जानते नहीं हैं, इसलिए न तो हमारा विश्वास उन भक्तों की भाँति दृढ़ हो पाता है और न परमात्मा से प्रगाढ़ प्रेम हो पाता है। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि जिस प्रकार प्रभु ने प्रह्लाद की रक्षा की, उसी प्रकार हमारी भी रक्षा हो तो हमें भी नारद जी के समान तत्वदर्शी ज्ञानी महापुरुष की शरण में जाकर उनकी कृपा से ईश्वर के तत्त्व स्वरूप का दर्शन कर उनके मार्ग-दर्शन में चलना होगा। तभी जीवन में भक्ति का रंग लग पाता है। साध्वी जी ने इसी प्रसंग में होली महोत्सव की भी चर्चा करते हुए कहा कि जीवन की कालिमा सुंदर भक्ति रंग से ही दूर की जा सकती है। भक्त सदा उसी भक्ति रंग में रंगकर संसार को भी रंगने का प्रयास करते हैं। आज इसी घटना को सत्य कर दिखाया है श्री आशुतोष महाराज जी ने। उनके तत्वाधन में संस्थान द्वारा ‘बंदी सुधर एवं पुनर्वास कार्यक्रम’- अंतर्क्रान्ति चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम द्वारा कैदियों में अभूतपूर्व परिवर्तन देखने को मिल रहा है। वह स्वयं सुधर कर आज सुधारक बन समाज कल्याण की राह पर बढ़ चुके हैं। कारण कि आज वह स्वयं उस भक्ति रंग में रंग चुके हैं।

श्रीमद्भागवत कथा में भाव विभोर करने वाले मधुर संगीत से ओत-प्रोत भजन-संकीर्तन को श्रवण कर भक्त-श्रद्धालु मंत्रामुग्ध् होकर झूमने को मजबूर हो गए।

 

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